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सारणीमें दिया गया अन्तरकाल निकालना

३. सारणीमें दिया गया अन्तरकाल निकालना     १. गुणस्थान परिवर्तन-द्वारा अन्तर निकालना    ध. ५/१.६.३/५/५ एक्को मिच्छादिट्ठी सम्मामिच्छत्त-सम्मत्त-संजमासंजम-संजमेसु बहुसो परियट्टिदो, परिणामपच्चण्णसम्मत्तं गदो, सव्वलहुमंतोमुहुत्तं त सम्मत्तण अच्छिय मिच्छत्तं गदो, लद्धमंतोमुहुत्तं सव्वजहण्णंमिच्छतंतरं। = एक मिथ्यादृष्टि जीव, सम्यग्मिथ्यात्व, अविरतसम्यक्त्व, संयमासंयम और संयममें बहुत बार परिवर्तित होता हुआ परिणामों के निमित्तसे सम्यक्त्वको प्राप्त हुआ, और वहाँपर सर्वलघु अन्तर्मुहूर्त काल तक सम्यक्त्वके साथ रहकर मिथ्यात्वको प्राप्त हुआ। इस प्रकारसे सर्व जघन्य अन्तर्मुहूर्त प्रमाण मिथ्यात्व गुणस्थानका अन्तर प्राप्त हो गया। ध.५/१,६.६/९/२ नाना जीवकी अपेक्षा भी उपरोक्तवत् ही कथन है। अन्तर केवल इतना है कि यहाँ एक जीवकी बजाय युगपत सात, आठ या अधिक जीवोका ग्रहण करना चाहिए। २ गति परिर्तन-द्वारा अन्तर निकालना ध.५/१, ६ ४५/४०/३ एक्को मणुसो णेइरयो देवो वा एगसमयावसेसाएसासणद्धाए पचिंदियतिरिक्खेसु उववण्णोत। तथ पंचाणउदिपुव्वकोडि अब्भहिय तिण्णि पलिदोवमाणि गमिय अवसाणे ( उवसमस...

अन्तर प्ररूपणा सम्बन्धी कुछ नियम

२. अन्तर प्ररूपणा सम्बन्धी कुछ नियम-     १. अन्तर प्ररूपणा सम्बन्धी सामान्य नियम ध.५/१,६, १०४/६६/२  जोए मग्गणाए बहुगणट्ठाणाणि अत्थि तोए त मग्गणछंडिय अण्णगुणेहि अंतराविह अंतरपरूवणा कादव्वा। जोए पुण्णमगणाए एगक्कं चेव गुणट्ठाण तत्थ अण्णमग्गणाए अतराविय अंतरपरूवणा कादव्वा इदि एसो सुत्ताभिप्पाओ। = जिस मार्गणामें बहुत गुणस्थान होते हैं, उस मार्गणाको नहीं छोड़कर अन्य गुणस्थानोंसे अन्तर कराकर अन्तर प्ररूपणा करनी चाहिए। परन्तु जिस मार्गणामें एक ही गुणस्थान होता है, वहाँपर अन्य मार्गणामें अन्तर  करा करके अन्तर प्ररूपणा करनी चाहिए। इस प्रकार यहाँपर यह सूत्रका अभिप्राय।      २. योग मार्गणामें अन्तर सम्बन्धी नियम ध.५/१,६, १५३/८७/९  कधमेगजीवमासेज्ज अतराभावो। ण ताव जोगं तरगमणेणंतरं सभवदि, मग्गणाए विणासापत्तोदो। ण च अण्णा गुणगमणेण अंतर सभवदि, गुणंतरं गदस्स जीवस्स जोगंतरगमणेण विणा पुणो आगमणाभावादो। - प्रश्न एक जीवकी अपेक्षा अन्तरका अभाव कैसे कहा ? उत्तर -सूत्रोक्त गुणस्थानों में न तो अन्य योगमें गमन-द्वारा अन्त...

१.अन्तर निर्देश

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१. अन्तर प्ररूपणा सामान्यका लक्षण- स.सि./१/८/२६ अन्तरं विरहकालः । = विरह कालको अन्तर कहते हैं। ( अर्थात जितने काल तक अवस्था विशेषसे जुदा होकर पुनः उसकी प्राप्ति नहीं होती उस कालको अन्तर कहते हैं । ) (ध.१/१,१,८/१०३/१५९ ) ( गो. जी./जी.प्र./५५३/९८२)  रा. वा. १/८/७/४२/५ अन्तरशब्दस्यानेकार्थवृत्तेः छिद्रमध्यविरहेष्वन्यतमग्रहणम्। ७ । [अन्तरशब्दः ] बहुष्वर्थेषु दृष्टप्रयोगः । क्वचिच्छिद्रे वर्तते सान्तरं काष्ठम्, सच्छिद्रम् इति । क्वचिदन्यत्वे 'द्रव्याणि द्रव्यान्तरमारभन्ते' [वैशे. सू. १/१/१०] इति । क्वचिन्मध्ये हिमवत्सागरान्तर इति। क्वचित्सामीप्ये 'स्फटिकस्य शुक्लरक्ताद्यन्तरस्थस्य तद्वर्णता' इति 'शुक्लरक्तसमीपस्थस्य' इति गम्यते । क्वचिद्विशेषे-"वाजिवारणलोहानां काष्ठपाषाणवाससाम् । नारीपुरुषतोयानामन्तरं महदन्तरम्"[गरुडपु. ११०/१५] इति महान् विशेष इत्यर्थः ।क्वचिद् बहिर्योगे 'ग्रामस्यान्तरे कूपाः' इति । क्वचिदुपसव्याने - अन्तरेशाटका इति । क्वचिद्विरहे अनभिप्रेतश्रोतृजनान्तरे मन्त्रं मन्त्रयते, तद्विरहे मन्त्रयत इत्यर्थः । = अन्तर शब्द के अनेक अर्थ है...

अंतर

कोई एक कार्य विशेष हो चुकनेपर जितने काल पश्चाद उसका पुनः होना सम्भव हो उसे अन्तर काल कहते हैं । जीवोंकी गुणस्थान प्राप्ति अथवा किन्हीं स्थान विशेषों में उसका जन्म-मरण अथवा कर्मो के बन्ध उदय आदि सर्व प्रकरणों में इस अन्तर कालका विचार करना ज्ञानकी विशदताके लिए आवश्यक है । इसी विषयका कथन इस अधिकारमें किया गया है । १. अन्तर निर्देश-     १. अन्तर प्ररूपणा सामान्यका लक्षण     २. अन्तरके भेद     ३. निक्षेप रूप अन्तरके लक्षण     ४. स्थानान्तरका लक्षण २. अन्तर प्ररूपणासम्बन्धी कुछ नियम-     १. अन्तरप्ररूपणा सम्बन्धी सामान्य नियम     २. योग मार्गणामें अन्तर सम्बन्धी नियम     ३. द्वितीयोपशम सम्यक्त्वमें अन्तर सम्बन्धी नियम     ४. सासादन सम्यक्त्वमें अन्तर सम्बन्धी नियम     ५. सम्यग्मिथ्यादृष्टि में अन्तर सम्बन्धी नियम     ६. प्रथमोपशम सम्यग्दर्शनमें अन्तर सम्बन्धी नियम ३. सारणीमें दिया गया अन्तर काल निकालना-     १. गुणस्थान परिवर्तन-द्वारा अन्तर निकालना     २. गति परिवर्तन-द्...

अंतरंग

 अंतरंग परिग्रह आदि -- दे. वह वह विषय ।

अंतडी

१. औदारिक शरीरमें अन्तड़ियोंका प्रमाण-दे. औदारिक १/७ । २. इनमें षट्काल कृत हानि वृद्धि--दे. काल/४ ।